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Thursday, September 24, 2026

हम कैसे हो गए और कैसा हो गया अमेरिका

 हम कैसे हो गए और कैसा हो गया अमेरिका

साल बीतते गए

खबर ही न हुई

हम बदलते गए

खबर ही न हुई

भूल गए हम वादे

न बदलने के

दृढ़ मान्यताएं

लाए थे जो साथ

कब ढीली पड़ती गईं

खबर ही न हुई

स्वदेश में परदेशी बन गए कब

खबर ही न हुई

परदेस अपना हो गया कब

खबर ही न हुई

अमेरिका भी बदलता गया

खबर ही न हुई

लगता था जो चमकीला

चमक उसकी कब घटती गई

खबर ही न हुई

अनावश्यक लगती थीं

जो सुविधाएं

कब आदत बन गईं 

खबर ही न हुई

बच्चे कब अमेरिकन बन गए

खबर ही न हुई

होता होगा कहीं अन्याय हम पर

या जातिभेद, रंगभेद, पर

अनजान हम ऐसे कि

खबर ही न हुई

अब बने बुद्धिमान

और थोड़े धनवान

पर जीवन कहाँ बह गया

खबर ही न हुई


- मीनल  पन्ड्या


मूल भाव (भावार्थ):

यह कविता प्रवासी भारतीयों (विशेषकर अमेरिका में बसे गुज़राती समुदाय) के मन के द्वंद्व, समय के बीतने और अनजाने में आए बदलावों को बहुत सादगी से दर्शाती है। इसमें अपनी जड़ों को भूलने का मलाल, नए देश को अपनाने की प्रक्रिया, और जीवन के अंतिम पड़ाव पर समझ आने वाली सच्चाई की भावुक झलक है।

Wednesday, September 9, 2026

कैसे थे हम और कैसा था अमरीका

 जब हम आये थे अमरीकामे

 

कैसे थे हम और कैसा था अमरीका

जवा और आशावान

शायद थोडे नादान

और थोडे नवशीखे

कोई कहे हमे थोडे मुर्ख भी

आधे पके, आधे कच्चे

ऐसे आये हम ये किनारे

जोशवान, आशावान, उमन्गसे भरपुर

लगे सफ़लताकी दौड दौड़ में

 थी भी नयी भुमि शक्यताओ से भरपुर

 

और

अमरीका भी बुला रहा था हाथ फैलाकर

हम भी शिखने लगे नये रीत रसम

नये लगते सब विचार

समय के साथ हम भी बदलते रहे

थोडे समजे, थोडा शीखे

और अपने आप बने भारत के प्रतिनिधि

बात हो धर्मकी

भारतके इतिहासकी, राजकारणकी, या  सस्क्रुतिकी

बीन समझ हम बाँटते रहे अपना आधा ज्ञान

जीसने भी पुछा

और अगर ना भी पूछा

हम बाँटते रहे

अमरीका भी था सहदसे भरपुर

सहद बोलने में, सहद खाने में

और सहद अत्र तत्र 

तक मीले सर्वत्र

अनजान थे हम अभी तक काचकी छत से

या जातिभेद से

या अमरीकाके इतिहास या भूगोलसे

बस थे खुश खुश

क्योकी हमारे पास था

हरा कार्ड और हरा डॉलर

 ऐसे थे हम और ऐसा था अमरीका

जब हम आए थे यहाँ



मिनल पड्या