जब हम आये थे अमरीकामे
कैसे थे हम और
कैसा था अमरीका
जवा और आशावान
शायद थोडे
नादान
और थोडे नवशीखे
कोई कहेता हमे
थोडे मुर्ख भी
आधे पके, आधे
कच्चे
ऐसे आये हम ये
किनारे
जोशवान,
आशावान, उमन्गसे भरपुर
लगे सफ़लताकी दौड मे
नयी भुमि
शक्यताओ से भरपुर
और
अमरीका भी बुला
रहा था हाथ फ़ैलाकर
हम भी शिखने
लगे नये रीत रसम
नये लगते सब
विचार
समयके साथ हम
भी बदले
थोडे समजे
और अपने आप बने
भारतके प्रतिनिधी
बात हो धर्मकी
भारतके
इतिहासकी, राजकारणकी, या सस्क्रुतिकी
बीन समज हम
बाटते रहे अपना आधा ग्नान
जीसने भी पुछा
और अगर ना भी
पुछा
अमरीका भी था सहदसे
भरपुर
सहद बोलनेमे,
सहद खानेमे
और अत्र तत्र
तक मीले सर्वत्र
अजाण थे हम अभी
तक काचकी छत से
या जातिभेद से
या अमरीकाके इतिहास
या भुगोलसे
बस थे खुश खुश
क्योकी हमारे
पास था
हरा कार्ड और
हरा डोलर
ऐसे थे हम और एसा था अमरीका
जब हम आये थे
यहा
मिनल पड्या